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नव वर्ष, नवीन दशक

90 के दशक की यादें कुछ कम ही हैं.. और जो हैं भी वो काफी धूमिल सी हैं.. ये जरूर याद है की रविवार को सवेरे "रंगोली" और बुधवार की शाम को "चित्रहार" से ही गानों का ज्ञान बढ़ता था। "लाल छड़ी मैदान खड़ी" हर रविवार का फेवरेट गाना था। पहले Captain Vyom और बाद में शक्तिमान अपने सुपर हीरो थे। काजू कतली बड़े इवेंट्स पर ही आती थी और नए कपडे होली और दिवाली पर ही बनते थे। उन दिनों दोपहर बहुत लम्बी हुआ करती थीं। स्कूल से आके खाने के बाद २ घंटे की नींद जरूरी थी।
फिर बड़ी जल्दी ही 2000 ज़माना आ गया। गाने बदले, खिलौने भी, और सुपरहेरो भी। पिताजी ने walkman दिलवा दिया था। और एक blank cassette में हमने भी vengaboys: the party album पूरी रिकॉर्ड करवा दी थी। WWE (जो तब WWF कहलाता था) देखा करते थे, शाम को pokemon और beyblade अपने फेवरेट थे। ये वही दशक था जिसके अंत तक जब हम कॉलेज भी जा पहुंचे थे। वहाँ दुनिया काफी अलग थी। साथ के लोग मेटालिका और एमिनेम का जिक्र करते थे। जब कोई पूछता की ये वाला सुना है क्या, तो मना भले ना करते हों, लेकिन डर रहता था की अगर कुछ और डिटेल पूछ ली तो सारी पोल खुल जानी है। कॉलेज थोड़ा adjusting वाला पीरियड होता है। ये वो वक़्त होता है जब आप अपनी उड़ान के लिए मांझे को तेज़ कर रहे होते हो। blend-in करने के लिए james blunt, bob marley, akon, eminem का loose yourself, linkin park का in the end, इत्यादि आप भी रट चुके होते हो, लेकिन हिमेश रेशमिया के "झलक दिखलाजा " पे अब भी कूद कूद के नाच निकल ही जाता है। पहले इश्क का दौर भी यही था। सही गलत किसे पता। कच्ची उम्र का प्यार कुछ समझदारी वाला थोड़े न होता है। वो तो बस हो जाता है। असली खेल तो कॉलेज ख़तम और नौकरी शुरू होने वाले पीरियड में होता है।
2011 वाले दशक में हमने पहली नौकरी भी शुरू की। ये वो दौर था जब सारी लड़ाई सबसे तेज़, और ज्यादा से ज्यादा सीख के, भीड़ से एकदम अलग दिखने को उतारू थे। मांजा तेज़ था ही, उड़ान के लिए तैयार भी। लेकिन तब ही थोड़ी maturity आने लगी थी कि ज़िन्दगी कोई जंग थोड़े ना है। हाँ उड़ना जरूर है, रुकना नहीं है। लेकिन मांझा भी अपने हाथ में ही रखना है। ये जरूरी है। आपका पहला या दूसरा इश्क आपको मांझे को अपने हाथ में रखने की जरूरत समझा देता है। आप टूटते तो नहीं हैं, पर कुछ बड़े जरूर हो जाते हैं। ये दशक काफी कुछ अपने को define करवाता है। मोदीजी की सरकार बानी। कुछ मित्र समर्थन में थे, कुछ विरोध में। कुछ से अच्छी बातें होने लगीं, कुछ इसी सब चक्कर में छूट भी गए। "मै सबसे श्रेष्ठ" वाले इस दौर की उड़ान अपनी क्षमता को आंकने के लिए जरूरी भी है।
खैर, आज दशक का आखरी रविवार है। चाय की चुस्की के साथ सोच रहे हैं आने वाले दशक की priorities क्या होंगी?
जैसे की मै कल कह रहा था की ये वो दौर है जब आप जान चुके हैं की आपकी उड़ान कितनी है। अब लड़ाई वर्चश्व की नहीं रही । survival और सबसे तेज़, सबसे आगे जाने की भी नहीं रही। अभी एक ठेहराव सा है। दशक का अंतिम इश्क भी निपट चुका है। अब और इश्क करने का ना तो समय बचा है ना ही शक्ति। शादी ब्याह वाला समय आ गया है।क्या इस ठेहराव वाले पोखरे में कोई पत्थर पड़ेगा? लहरें उठेंगी? क्या हम भी उठेंगे एक बार फिर मांझे पर धार लगाने के लिए? हाँ इस बार पूरी कोशिश रहेगी की मांझा अपने हाथ में ही रहे।
और जहां तक इस दशक के music का सवाल है : जगजीत सिंह और चित्रा की आवाज़ फिर से अच्छी लगने लगी है, कभी रफ़ी और किशोर कुमार भी बजा लेते हैं। जब खुश होते हैं तो पुराने गाने सुन लेते हैं.. अब समस्याओं को लेके रोते नहीं हैं..दुखी होते हैं तो दिल की धड़कनों को नार्मल रखने का प्रयास करते है..
डिस्क जाते हैं तो कुछ moves बादशाह के गानो पर भी बना ही लिए हैं।
अंदर का कोहली/सहवाग पवेलियन लौट चुका है.. अब जो है बस राहुल द्रविड़ है..उसी को विकिट बचाये रखना है.. जीत की कोशिश करनी है.. और worst case scenario में मैच draw कराना है.. 💖
कभी कभी सोचते हैं क्या इतना adjusting होना ठीक भी है? जैसी चल रही है वैसे ही चलते रहने देना क्या smart choice है?

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